Friday, February 8, 2013

चूल्हे की आंच


source: google
पिछले दिनों गांव जाना हुआ तो कल्लू दादा के घर थोड़ी देर के लिए रुका। घर में करीब दस साल की उनकी पोती संगीता चूल्हे पर रोटियां बना रही थी। उसके चार छोटे भाई-बहन भूख से बिलबिला रहे थे और रोटियों का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। दो साल पहले संगीता की मां का देहांत हो गया था। अब तक पता नहीं चल पाया है कि उसे क्या हुआ था। लोग बताते हैं कि उसे अचानक पेट में दर्द हुआ। पड़ोस के गांव में एक झोलाछाप डॉक्टर को उसे दिखाया और रात में ही उसकी सांसें थम गईं। मां की मौत के बाद संगीता पर ही घर के कामकाज की सारी जिम्मेदारी आ गई। उसका ज्यादातर वक्त चूल्हा चौका और नल से पानी लाने में ही गुजरता है। इतना करने के बाद भी जरा सी गलती पर बाप का कोप भी झेलना पड़ता है। उसकी हालत देखकर एक अजीब सी बेचैनी होने लगी। जिस उम्र में उसके हाथ में कलम-किताब होनी चाहिए, उस उम्र में चूल्हे की आंच से उसके तपते बचपन को देखकर मैं भीतर से कराह उठा।

कल्लू दादा के घर उस दिन मेहमान आए थे। संगीता ने घर में पड़े आलुओं की दो तरकारी बना दी। सब्जी अब उनके यहां कभी-कभी ही बनती है। चटनी के साथ रोटी खाकर ही उनका पेट भरता है। उस दिन सब्जी बनी देख संगीता के छोटे भाई-बहन जिद करने लगे। संगीता ने सबकी कटोरी में 1-2 आलू के टुकड़े और खूब सारी तरी डाल दी। बच्चे मजे से खाना खाने लगे। सबके खाने के बाद संगीता के लिए सब्जी नहीं बची। उसे चटनी रोटी खाकर ही पेट भरना पड़ा। कल्लू दादा की गिनती पहले गांव के सबसे रईस किसानों में होती थी। 40-45 बीघा खेत से इतना हो जाता था कि जिंदगी आराम से चलती थी और काफी बच भी जाता था। लेकिन पिछले कुछ सालों से पड़ रहे सूखे ने बुंदेलखंड के तमाम किसानों की तरह उन्हें भी दाने-दाने को मोहताज कर दिया है। अब उन्होंने अपनी ज्यादातर खेती गिरवी रख दी है और बांदा में चौकीदारी कर रहे हैं।

पूछने पर उन्होंने बताया कि बारिश न होने पर अब खेती से लागत निकालने में भी मुश्किल होती है। ऐसे में बच्चों को पालने के लिए उन्होंने खेतीबाड़ी छोड़ दी और चौकीदारी करना ही बेहतर समझा। उन्होंने बताया कि कुछ वक्त बाद वे गांव भी छोड़ देंगे और बांदा में मजदूरी कर बच्चों को पढ़ाएंगे। कल्लू दादा से बात करने के बाद मुझे अखबार में छपी एक खबर याद आ गई। खबर में बताया गया था कि एक किसान ने खेत में जाकर जब अपनी फसल की हालत देखी तो वह बेसुध हो वहीं गिर पड़ा और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। कुछ चीजें बाहर से देखने में शांत नजर आती हैं लेकिन उनके भीतर अथाह लहरें हिलोरें मार रही होती हैं। बुंदेलखंड के गांव भी ऐसे ही हैं। बाहर से देखने में शांत लेकिन हर घर में दुखों का बेहिसाब सिलसिला। दिल्ली लौटने पर मेरे जेहन में कई दिनों तक संगीता का मासूम चेहरा घूमता रहा।

Tuesday, January 1, 2013

वह सार्वजनिक लूट


उस दिन मैं खजुराहो से हजरत निजामुद्दीन आने वाली उत्तर प्रदेश संपर्क क्रांति (कुर्ज) एक्सप्रेस में रिजर्व सीट पर यात्रा कर रहा था। खजुराहो से अगले स्टेशन महोबा में टेन मानिकपुर से आने वाली दूसरी टेन में जुड़ कर करीब सवा आठ बजे आगे बढ़ गई। हमेशा की तरह इस बार भी भीड़ काफी ज्यादा थी। इस वजह से जो लोग जनरल डिब्बों में जगह नहीं पा सके, वे आरक्षित डिब्बों में आकर बैठ गए। उनमें से ज्यादातर लोगों को शायद पता ही नहीं था कि ये आरक्षित डिब्बे हैं।

किसी ने उन्हें इन डिब्बों में चढ़ने से रोका भी नहीं। अगले स्टेशन हरपालपुर में भीड़ और बढ़ गई। कुछ लोग टॉयलेट के पास गैलरी में तो कुछ गेट के पास खाली पड़ी जगह में बैठ गए। अपनी सीट पर बैठे लोगों को डर था कि कहीं चालू टिकट लेकर आरक्षित डिब्बे में चढ़ने वाले उनकी सीट पर न बैठ जाएं, इसलिए वे करीब करीब पसरे हुए थे। इस बीच अचानक कंपार्टमेंट में हलचल होने लगी। पूछने पर पता चला कि टीटी चालू टिकट लेकर आरक्षित डिब्बे में चढ़ने वालों को धमका रहा था। उसके हाथ में जुर्माने की रसीदें थीं जिनका इस्तेमाल वह सिर्फ डराने के लिए कर रहा था। जब एक लड़के ने कहा कि उसके पास पैसे नहीं हैं तो टीटी ने उसका गिरेबान पकड़कर डिब्बे से उतार दिया। इसके बाद वह उसे गालियां भी देने लगा।

इस तरह उसने डिब्बे में बैठे लोगों को संकेत दे दिया कि अगर उनके पास भी पैसे नहीं हैं तो यही हश्र उनका होने वाला है। टीटी ने अपनी तेज निगाहों से ऐसे लोगों की पहचान कर ली और उन्हें पैसे निकालने को कहकर आगे बढ़ गया। डिब्बे में टिकट चेक करने के बाद टीटी फिर उन लोगों के पास पहुंचा। चालू टिकट देखकर किसी से तीन सौ तो किसी से चार सौ रुपए मांगने लगा। उसने चालू टिकट वाले किसी भी शख्स को नहीं बख्शा। जिससे जितने बन पड़े, उतने पैसे ऐंठ लिए। लेकिन उसने किसी की भी जुर्माने की पचीर् नहीं काटी। सिर्फ एस-5 और एस-6 में करीब 65-70 लोग टीटी की इस सार्वजनिक लूट का शिकार बने।
डिब्बे में करीब 50 साल की एक महिला भी थी। उसके पास चालू टिकट तो था लेकिन टीटी की जेब गर्म करने के लिए पैसे नहीं थे। वह गलती से आरक्षित डिब्बे में चढ़ गई थी। जब टीटी उसके पास पहुंचा तो वह फूट-फूटकर रोने लगी। महिला टीटी से विनती कर रही थी कि उसे छोड़ दे, लेकिन वह बिना पैसे लिए मानने को तैयार न था। महिला अपने बच्चों की कसम खाकर कह रही थी कि उसके पास पैसे सचमुच नहीं हैं। काफी देर तक बहस करने के बाद टीटी ने अगले स्टेशन पर उसे डिब्बे से उतर जाने को कहा। इसके बाद स्लीपर डिब्बों में लोगों से उगाही के बाद वह खुद एसी कंपार्टमेंट में घुस गया और फिर लौटकर नहीं आया।

Sunday, September 2, 2012

अचानक

अच्छा खासा काम में
लगा आदमी
आ सकता है
सड़क पर
अचानक
कभी भी कह सकते हैं
बॉस-
देख लो अपना ठिकाना
अब तुम्हारी नही जरुरत

अचानक रसोई में
कमी हो सकती है
आटा दाल चावल चीनी की
बंद हो सकता है अचानक
बच्चे को आनेवाला दूध
और उसका प्राइवेट स्कूल में
पढ़ना
मकान मालिक
करवा सकता है
अचानक
कमरा खाली

अभी अभी
थोड़ा ढंग से जीने की
सर उठाती हसरतें
गिर सकती हैं
अचानक
औंधे मुंह..

आदत

अब नहीं वो गुस्सा करते
भाड़ा बढ़ने पर बस का
आटा-दाल-चीनी-सब्जी
महंगी होने पर
नहीं शिकन आती माथे पर
अब वो आदत डाल रहे हैं
पैदल चलने की
हवा खाकर जिंदा
रहने की..

लोकेशन

अभी कल तलक
कहते थे-
नहीं होने देंगे अन्याय
लडेंगे अत्याचारी से
झोपड़ी और गगन चूमती
एसीदार इमारतों के बीच
कर देंगे खत्म फासला
आज वह भी,
उन्हीं लोगों की जमात में
हो गए हैं शामिल
सबसे आगे चल रहे हैं उठाकर
उनका झंड़ा
उसी एसीदार इमारत पर
ले लिया है फ्लैट
बालकनी में खडे़ होकर
देखता है झोपड़ी की तरफ
जहां से उठकर आया है
अब खटक रही है उसे
अपने बगल में
उस झोपड़ी की लोकेशन।

Wednesday, July 11, 2012

गांव में मट्ठा की जगह पेप्सी

शहरों के प्रभाव से गांवों के खानपान में धीरे - धीरे से कृत्रिमता घुलती जा रही है। सतही तौर पर ऐसे परिवर्तन भले ही मामूली नजर आएं लेकिन ग्रामीणों की अर्थव्यवस्था पर इनका गहरा असर पड़ रहा है। बाजार के प्रभाव और खुद को मॉडर्न दिखाने के लिए ग्रामीणों के खानपान में बहुत सी ऐसी चीजें शामिल होती जा रही हैं जिनसे एक दशक पहले तक वे लगभग अनजान थे। इसी के साथ कुछ परंपरागत चीजें पीछे छूटती जा रही हैं। माठा यानि मट्ठा या छाछ का धीरे - धीरे गायब होना इसी परिवर्तन का प्रतीक है। इसे दुर्भाग्य कहें या बाजार का मायाजाल कि गांवों में माठा की जगह पेप्सी , कोका कोला आदि कोल्ड ड्रिंक्स ने ले ली है। गरीब किसानों के बच्चे अब माठा की जगह पेप्सी की जिद करते हैं। कई किसान अनाज बेचकर कोल्ड ड्रिंक्स मंगा रहे हैं। बहुत पहले की बात नहीं है जब गांव के घर - घर मंे माठा भांया जाता था। अक्सर माठा भाने की आवाज से लोगों की नींद टूटती थी। गरीब घरों में सब्जी - दाल न बनने पर माठा में रोटी मीसकर खा ली जाती थी। दूध से यह बिना खर्च आसानी से उपलब्ध था। मेहमानों की आवभगत और शादी समारोहों में माठा से सन्नाटा यानी रायता बनाकर परोसा जाता था। सन्नाटा न हो तो भोज फीका लगता था। ऐसे मौकों पर माठा कम पड़ने पर आसपास के कई घरों से मंगा लिया जाता था। अब शादी समारोह में माठा से बनने वाले सन्नाटे की बजाय कोल्ड ड्रिंक की मांग उठ रही है। बांदा जिले में स्थित मेरे गांव में करीब दस साल पहले शादी या किसी समारोह पर लोगों को कमल के पत्ते पर खाना परोसा जाता था। गांव के तालाब से कमल के पत्ते मुफ्त मेें मिल जाते थे। खाना परोसने से पहले पत्तों को धोया जाता था। जब पानी की बूंदे कमल के पत्तों पर पड़ती थीं तो वे मोतियों जैसी इधर - उधर लुढ़कने लगतीं थीं। अब कमल के पत्तों की जगह फैंसी थालियों ने ले ली है। मेहमानों को पांत मंे बिठाकर प्यार से खाना खिलाने की परंपरा भी भूली बिसरी बात होती जा रही है। करीब 20 साल पहले जब मेरी बहन की शादी हुई थी तब बरात 3 दिन तक ठहरी थी। उस वक्त शादी में 3 दिन लगते थे। आज यह बात किसी अचंभे से कम नहीं लगती। करीब 5-7 साल पहले बरातें ट्रैक्टर - ट्रॉलियों में खूब जाती थीं। अब ट्रैक्टर में बरातें दिखनी लगभग बंद होती जा रही हैं। खुद को मॉडर्न दिखाने की चाह में और दूसरे लोगों के दबाव में लोग कर्ज लेकर बस , जीप , बोलेरो और कारों में बरातें ले जा रहे हैं। बदलाव की मार कैथा नामक फल पर भी पड़ी है। उसकी चटनी का स्वाद आज भी मुझे याद है। हर बार गांव जाने पर सोचता हूं कि कहीं से कैथा की चटनी मिल जाए लेकिन पिछले कुछ सालों से लगातार निराशा ही हाथ लग रही है।

Saturday, January 14, 2012

बेबसी, बदहाली और बुंदेलखंड

अचानक ताऊजी की मौत पर पिछले दिनों गांव जाना हुआ, तो बुंदेलखंड की बदहाली देखकर दिल पसीज गया। गांव-गांव में पसरा मातमी सन्नाटा देखकर सिर से पांव तक सिहरन सी दौड़ गई।

खेती से दो जून की रोटी मयस्सर न होने के कारण वहां से लोगों का बेतहाशा पलायन जारी है। खाली गांव और तमाम रेलवे स्टेशनों पर लोगों के बुझे चेहरे उनकी तकलीफ बयां करते हैं। ये हाल तब है जब यह खेती का सीजन है।

बाकी दिनों के हालात और भी भयावह होते हैं। दिल्ली के निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से महाकौशल और यूपी संपर्क क्रांति एक्सप्रेस बुंदेलखंड जाती हैं। इन दोनों ट्रेनों में, खासकर चालू डिब्बों में पैर रखने तक की जगह मुश्किल से मिलती है। इस बार रिजर्वेशन न मिलने के कारण मैंने सपरिवार चालू डिब्बे में ही जाने का फैसला किया। सवा चार बजे चलने वाली महाकौशल एक्सप्रेस ठसाठस भरी थी।

बड़ी मशक्कत के बाद हम ट्रेन में घुस गए। गाड़ी के अंदर मची बदहवासी और उमस भरी गर्मी ने पसीने से तर कर दिया। गाड़ी के दो घंटे लेट होने पर हमारी हिम्मत जवाब दे गई और हम उतर गए। सोचा कि सवा आठ बजे वाली यूपी संपर्क क्रांति से जाएंगे लेकिन उसमें भी राहत नहीं थी।

इमर्जेंसी खिड़की से घुसकर सीट पर कब्जा करना पड़ा। चार की सीट पर सात लोग किसी तरह एडजस्ट होकर बैठ गए। ऊपर की सीटों पर भी 6-6 लोग उकडूं बैठे थे। आते वक्त मैं इस परेशानी से बचना चाहता था, इसलिए बांदा पहुंचते ही तत्काल कोटे से रिजर्वेशन करा लिया। स्टेशन पर मैं समय रहते पहुंच गया।

वहां लोगों का हुजूम देखकर ऐसा लगा जैसे पूरा बुंदेलखंड ही पलायन कर रहा हो। कोई अकेला तो कोई अपने परिवार के साथ दो वक्त की रोटी की तलाश में शहर जा रहा था। गाड़ी आई और देखते की देखते भूसे की तरह भर गई। पूरे स्टेशन पर अफरातफरी का माहौल था। अधनंगे बच्चे खाली पांव अपने मां-बाप के साथ इस डिब्बे से उस डिब्बे में भटक रहे थे।

औरतें गोदी में बच्चे लिए और सिर पर गठरी बांधे पागलों की तरह यहां-वहां भागती दिखीं। चालू डिब्बे में जगह न मिलने पर लोग आरक्षित डिब्बों में घुस गए। गेट के पास थोड़ी सी जगह में दर्जनों लोग किसी तरह बैठ गए। कुछ अंदर आकर किसी के पैर के नीचे तो कोई किसी की सीट के नीचे घुसकर लेट गया।

वक्त के मारे इन लोगों को टीटी ने भी नहीं बख्शा। जिससे जितना बना उसने ऐंठ लिए। थोड़ी देर के लिए मैं टीटी की काली कमाई का हिसाब लगाने लगा। फिर अचानक लोगों के मुरझाए चेहरों पर नजर टिक गई। वे काफी देर तक मेरे जेहन में घूमते रहे। ख्याल आया कि यही लोग शहर की किसी झुग्गी झोपड़ी में अपने ठिकाने की तलाश करेंगे।

जिनको यह भी नसीब नहीं होगा वे किसी फ्लाईओवर के नीचे या फुटपाथ पर रात गुजारेंगे। रात की ड्यूटी में जब कैब से घर लौट रहा होता हूं, ऐसे लोग अक्सर मुझे बड़ी तादाद में नजर आ जाते हैं।