Wednesday, August 6, 2014

हम लूज़रों की कहानी

लूजर कहीं का! हम सबकी कहानी हो सकती है। उनकी कहानी हो सकती है जो प्यार में हारे हैं, या छलावे में जीते हैैं। जिन लोगों ने खुद को खोकर ही खुद को पाया है, उनकी कहानी तो है ही।
कहानी का नायक पांडे अनिल कुमार सिन्हा देश के उन लाखों युवकों में से एक है जो बिहार या किसी भी प्रदेश के छोटे से कस्बे से दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने आते हैं। उसके पिता उन लाखों पिताओं में एक हैं जो बेटे को कुछ बनाने का सपना देखकर महानगर में पढ़ने भेजते हैं। उसके दोस्त बिल्कुल हमारे और तुम्हारे दोस्तों जैसे ही हैं जो एक दूसरे से भले ही लड़ते हों लेकिन उनमें प्यार हमेशा बना रहता है।
पांडे अनिल कुमार सिन्हा यानी पैक्स एक लूजर यानी हारे हुए इंसान का प्रतिनिधित्व करता है। हिंदी भाषी बेल्ट या दूसरे क्षे़त्रों के भी उन तमाम लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जो छोटे से कस्बे से उठकर दिल्ली जैसे महानगर में अचानक आ धमकते हैं और यहां के अल्ट्रा मॉडर्न समाज को देखकर हैरान हो जाते हैं। इस समाज को देखकर उनमें एक अजीब से बेचैनी पैदा हो जाती है। एक खास किस्म की हीनभावना उनके मन में बैठ जाती है और वे अपने गांव या कस्बों की हेय नजर से देखने लगते हैं।
लूजर कहीं का उन युवाओं की भी कहानी हो सकती है जो मात्र तस्वीर देखकर ही अपने दोस्तों की भाभी चुन लेते हैं। उसकी तस्वीर को तकिए के नीचे छिपाकर रखते हैं और रात बेरात उठकर उसे देखते हैं।
लेखक पंकज दुबे ने हिंदी बेल्ट के हीन भावना से ग्रस्त एक युवक की कहानी को बहुत ही कॉमिक अंदाज में बयां किया है। हिंदी में शुद्धता के पक्षधरों को लेखक की भाषा खटक सकती है। अंग्रेजी के शब्दों का बेरोकटोक इस्तेमाल कहानी के प्रवाह को आगे ही बढ़ाता है। पांडे और उसके दोस्तों के बीच के संवाद गुदगुदाते हैं। कहानी में फिल्मी मसाला कब घुल जाता है, इसका पता ही नहीं चलता। कहानी के मुख्य पात्रों खासकर सुबोध, निशांत और मयंक की भी एक अलग दुनिया है। पैक्स की कहानी के समानांतर उनकी भी कहानी आगे बढ़ती है।
कहानी का एक और दिलचस्प पहलू है दिल्ली विश्वविद्यालय का माहौल और वहां का बारीक जानकारियां। इसे सिर्फ वही बयां कर सकता है जिसने डीयू की जिंदगी को करीब से देखा और दिल से जिया हो। लूजर कहीं का छात्रसंघ चुनाव की राजनीतिक साजिशों का जीता जागता दस्वावेज भी है।

Thursday, September 26, 2013

एक खतरनाक आदमी

ड्राइवर सीट पर एक खतरनाक
आदमी बैठा है
इस सीट तक वो बेहिसाब
तिकड़म भिडाकर पहुंचा है
उसे प्राप्त है आशीर्वाद
अपने आकाओं का
जिन्हीने अयोग्य होते हुए भी
उसे सौंप दी है चाबी
उसका पास न तो 'लाइसेंस' है,
न ही अनुभव
उसकी सारी डिग्री भी
फर्जी हैं
हालाँकि देखने में नहीं लगता
उसमे कोई कमी है.
बहुत चालाक है वो,
सीट के सभी दावेदार
उसने साज़िश के तहत
ख़त्म कर दिए हैं
गाडी में बैठी सवारियां
सलामत रहें
इसके लिए जरूरी है
उसे गाडी से उतारना ।

Saturday, September 14, 2013

अपराध में भागीदारी

उमस भरी गर्मी में एसी बस देखकर राहत महसूस हुई। भागकर बस में चढ़ा और टिकट लेकर सीट पर कब्जा जमा लिया। ऑफिस टाइम पर बड़े दिनों बाद एसी बस मिली थी। 25 रुपए की टिकट लेकर सोचा कि क्यों न थोड़ी देर की नींद ले ली जाए। यह ख्याल आया ही था कि 13-14 साल के लड़कों का जत्था धड़ाधड़ बस में घुस आया। सफेद शर्ट और नीली पेंट में वे सभी स्कूल में पढ़ने वाले लग रहे थे। ड्राइवर के पास की सीटों पर उन्होंने कब्जा जमा लिया। कंडक्टर ने टिकट लेने के लिए आवाज लगाई लेकिन वे उसे अनुसना कर अपनी बातों में मस्त थे। दोबारा आवाज लगाने पर भी असर नहीं हुआ तो झल्लाकर तीसरी बार कंडक्टर ने टिकट लेने को कहा। एक लड़का बोल पड़ा- 'नहीं ले रहे टिकट।' कंडक्टर ने उन्हें उतारने के लिए बस रुकवाई तो दूसरा छात्र बोला- 'आगे उतरना है।'

कंडक्टर भी अड़ गया था- 'टिकट ले लो, नहीं तो नीचे उतरो।' फिर ड्राइवर से मुखातिब हो कंडक्टर ने चेतावनी दे दी 'आगे सबको उतार दियो, न उतरें तो बस साइड में रोक दियो।' थोड़ा आगे चलकर स्टैंड आ गया और वे लड़के कंडक्टर को गरियाते हुए बस से उतर गए। कंडक्टर भी प्रतिक्रिया में उनके मां-बाप को गालियां दे रहा था। बस जैसे ही आगे बढ़ी, एक जोर की आवाज सुनाई दी। एक पल को लगा जैसे किसी कार या दूसरी बस ने पीछे से टक्कर मार दी हो। मुड़कर देखा तो अपनी बस का पिछला शीशा चकनाचूर हो चुका था। बस से उतारने पर उन लड़कों ने यह कारस्तानी की थी। इसके बाद वे एकदम गोली हो गए थे।

कंडक्टर ने साइड में बस रुकवाई और नीचे उतर गया। सवारियों को भी पता चल गया था कि अब बस आगे नहीं जाएगी। उमस भरी गर्मी में एसी बस ने जो अनुभूति मुझे कुछ देर पहले दी थी वह नदारद हो चुकी थी। कंडक्टर 100 नंबर को फोन कर पुलिस के आने का इंतजार कर रहा था और सवारियों दूसरी बस का। पांच मिनट बाद ही दूसरी एसी बस आ गई और लोगों के साथ मेरे भी पैसे और ज्यादा वक्त बर्बाद होने से बच गया। इस घटना ने मेरे स्कूल और कॉलेज के समय की कुछ घटनाओं की याद ताजा कर दी।

ग्यारह साल पहले बारहवीं में पढ़ाई के दौरान क्लास में पढ़ने वाले कुछ शरारती छात्रों ने साकेत में स्कूल के पास से गुजरने वाली ब्लू लाइन बस से शीशे तोड़ने के साथ ही कंडक्टर की भी पिटाई कर दी थी। वजह आज की घटना वाली ही थी- कंडक्टर का टिकट के लिए पैसे मांगना। अंतर बस इतना है कि पहले जो काम बड़ी क्लास में पढ़ने वाले और कॉलेज जाने वाले छात्र करते थे, अब वही सातवीं और आठवीं के बच्चों का शगल बन गया है। ऐसी घटनाएं अपराध की श्रेणी में तब भी थीं, अब भी हैं। फर्क बस इतना है कि इसमें नाबालिगों की भागीदारी विकास की दावेदारी से कहीं ज्यादा बढ़ी है।

उनकी भूख

Photo Source : India times
उनकी भूख
नहीं मिटती रोटी से
सब्जी-चावल-दाल खाकर
नहीं पेट भरता उनका
उनकी प्यास का पानी से
नहीं है रिश्ता
उन्हें जायका लग चुका है
ताजे गोश्त का
गरमागरम रक्त का
उन्हें पसंद आते हैं
ढेर लाशों के
भूख उनकी वोटों की है..


सिक्कों की खनकती आवाजें
और एक खास किस्म की कुर्सी
जिसके पाए हड्डियों के 

चूर्ण से बने हैं
उसके बीचोंबीच भरा है
मासूमों का मुलायम मांस
उनकी रूह से मवाद
रिसता है दिनरात
उनके हाथों में कानून की
किताबें है
और जेब में रिवाल्वर
रातें उनकी साजिशों में गुजरती है
और फिर धीरे-धीरे
दंगे की आग सुलगती है। 

Wednesday, March 27, 2013

वह घर नहीं जाना चाहती थी

उस रात करीब एक बजे मैं ऑफिस से घर जा रहा था। संगम विहार में थाने से कुछ कदम ही आगे बढ़ा था कि रोड पर कुछ हलचल नजर आई। दूर से लग रहा था कि जैसे कुत्ता रोड पर पड़े कंबल में कुछ ढूंढ रहा है। अपनी बाइक मैंने पास से निकाली तो देखा- उस कंबल में एक बुजुर्ग औरत लिपटी पड़ी है। रोड पर किसी को पड़ा देखकर मैं अक्सर आगे बढ़ जाता हूं। ऐसे किसी शख्स के लिए रुकना या मदद करना मुझे वक्त की बर्बादी लगता है। साथ ही किसी लफड़े में फंस जाने का डर भी कहता है कि 'अपना काम करो, क्यों फालतू का झंझट मोल लेते हो।'

source: India Today
उस रात भी इस विचार के साथ मैं आगे बढ़ लिया। लेकिन थोड़ी दूर जाकर ही अचानक मैंने बाइक मोड़ी और कंबल में लिपटी उस बुजुर्ग के पास पहुंच गया। पास ही पड़ी उसकी बैसाखियां बता रहीं थीं कि वह चलने-फिरने की हालत में भी नहीं है। सबसे पहले मैंने उसे एक राहगीर की मदद से बीच रोड से हटाकर साइड में लिटा दिया। फिर उससे रोड पर पड़े होने की वजह और उसके घर के बारे में पूछने लगा। वह बार-बार यही कह रही थी-'मोए मज्जान दे बेटा। गाड़ी ऊपर से निकल जैहै तो मुक्ति मिल जैहे। मोए जिंदा नाय रहनो। बेटा और नाती ने मेई जे दशा कद्दई है।' मैं उससे बात कर ही रहा था कि एक पुलिस वाला बाइक पर वहां आकर रुका। मैंने उसे बताया कि इस बुढ़िया को उसके बच्चों ने घर से निकाल दिया है। लेकिन पुलिस वाला कहीं जाने की जल्दी में था। उसने कहा कि 100 नंबर पर कॉल कर दो। मैंने उसकी बात मानकर 100 नंबर पर मैसेज दिया और पीसीआर के आने का इंतजार करने लगा।

कुछ राहगीर थोड़ी-थोड़ी देर के लिए वहां रुकते और आगे बढ़ जाते। इस बीच जाने कब बजुर्ग फिर से रोड के बीच आकर लेट गई। कुछ राहगीरों की मदद से बड़ी मुश्किल से उसे उठाकर फिर सड़क किनारे लिटाया। लोगों के पूछने पर वह अपना दर्द बताने लगी-' बेटा और नाती ने मोए सिर पर मारो है'। वह अपना सूजा हुआ सिर हमें दिखाने लगी। उसने बताया कि वह पास ही डिस्पेंसरी के नजदीक रहती है। हमने उससे घर पहुंचा देने को कहा तो वह साफ मना करने लगी। बार-बार यही बोले जा रही थी- 'मोए मज्जान दो, मोए घर नाए जानो। बे फिर मारेंगे मोए।' इतने में पीसीआर की गाड़ी वहां पहुंच गई। मैंने पीसीआर से उतरे एक पुलिस वाले से कहा कि अम्मा जी को उनके घर पहुंचा दीजिए। उससे कुछ देर पूछताछ के बाद एक पुलिस वाला और एक आदमी उसे उठाकर उसके घर की ओर चल दिए। पुलिस वाले ने मेरा नाम, पता और फोन नंबर लिखकर जाने को कह दिया। थोड़ी देर बाद में मैं अपने घर तो पहुंच गया लेकिन उसके ख्याल ने मुझे पूरी रात नहीं सोने दिया।

Friday, February 8, 2013

चूल्हे की आंच


source: google
पिछले दिनों गांव जाना हुआ तो कल्लू दादा के घर थोड़ी देर के लिए रुका। घर में करीब दस साल की उनकी पोती संगीता चूल्हे पर रोटियां बना रही थी। उसके चार छोटे भाई-बहन भूख से बिलबिला रहे थे और रोटियों का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। दो साल पहले संगीता की मां का देहांत हो गया था। अब तक पता नहीं चल पाया है कि उसे क्या हुआ था। लोग बताते हैं कि उसे अचानक पेट में दर्द हुआ। पड़ोस के गांव में एक झोलाछाप डॉक्टर को उसे दिखाया और रात में ही उसकी सांसें थम गईं। मां की मौत के बाद संगीता पर ही घर के कामकाज की सारी जिम्मेदारी आ गई। उसका ज्यादातर वक्त चूल्हा चौका और नल से पानी लाने में ही गुजरता है। इतना करने के बाद भी जरा सी गलती पर बाप का कोप भी झेलना पड़ता है। उसकी हालत देखकर एक अजीब सी बेचैनी होने लगी। जिस उम्र में उसके हाथ में कलम-किताब होनी चाहिए, उस उम्र में चूल्हे की आंच से उसके तपते बचपन को देखकर मैं भीतर से कराह उठा।

कल्लू दादा के घर उस दिन मेहमान आए थे। संगीता ने घर में पड़े आलुओं की दो तरकारी बना दी। सब्जी अब उनके यहां कभी-कभी ही बनती है। चटनी के साथ रोटी खाकर ही उनका पेट भरता है। उस दिन सब्जी बनी देख संगीता के छोटे भाई-बहन जिद करने लगे। संगीता ने सबकी कटोरी में 1-2 आलू के टुकड़े और खूब सारी तरी डाल दी। बच्चे मजे से खाना खाने लगे। सबके खाने के बाद संगीता के लिए सब्जी नहीं बची। उसे चटनी रोटी खाकर ही पेट भरना पड़ा। कल्लू दादा की गिनती पहले गांव के सबसे रईस किसानों में होती थी। 40-45 बीघा खेत से इतना हो जाता था कि जिंदगी आराम से चलती थी और काफी बच भी जाता था। लेकिन पिछले कुछ सालों से पड़ रहे सूखे ने बुंदेलखंड के तमाम किसानों की तरह उन्हें भी दाने-दाने को मोहताज कर दिया है। अब उन्होंने अपनी ज्यादातर खेती गिरवी रख दी है और बांदा में चौकीदारी कर रहे हैं।

पूछने पर उन्होंने बताया कि बारिश न होने पर अब खेती से लागत निकालने में भी मुश्किल होती है। ऐसे में बच्चों को पालने के लिए उन्होंने खेतीबाड़ी छोड़ दी और चौकीदारी करना ही बेहतर समझा। उन्होंने बताया कि कुछ वक्त बाद वे गांव भी छोड़ देंगे और बांदा में मजदूरी कर बच्चों को पढ़ाएंगे। कल्लू दादा से बात करने के बाद मुझे अखबार में छपी एक खबर याद आ गई। खबर में बताया गया था कि एक किसान ने खेत में जाकर जब अपनी फसल की हालत देखी तो वह बेसुध हो वहीं गिर पड़ा और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। कुछ चीजें बाहर से देखने में शांत नजर आती हैं लेकिन उनके भीतर अथाह लहरें हिलोरें मार रही होती हैं। बुंदेलखंड के गांव भी ऐसे ही हैं। बाहर से देखने में शांत लेकिन हर घर में दुखों का बेहिसाब सिलसिला। दिल्ली लौटने पर मेरे जेहन में कई दिनों तक संगीता का मासूम चेहरा घूमता रहा।

Tuesday, January 1, 2013

वह सार्वजनिक लूट


उस दिन मैं खजुराहो से हजरत निजामुद्दीन आने वाली उत्तर प्रदेश संपर्क क्रांति (कुर्ज) एक्सप्रेस में रिजर्व सीट पर यात्रा कर रहा था। खजुराहो से अगले स्टेशन महोबा में टेन मानिकपुर से आने वाली दूसरी टेन में जुड़ कर करीब सवा आठ बजे आगे बढ़ गई। हमेशा की तरह इस बार भी भीड़ काफी ज्यादा थी। इस वजह से जो लोग जनरल डिब्बों में जगह नहीं पा सके, वे आरक्षित डिब्बों में आकर बैठ गए। उनमें से ज्यादातर लोगों को शायद पता ही नहीं था कि ये आरक्षित डिब्बे हैं।

किसी ने उन्हें इन डिब्बों में चढ़ने से रोका भी नहीं। अगले स्टेशन हरपालपुर में भीड़ और बढ़ गई। कुछ लोग टॉयलेट के पास गैलरी में तो कुछ गेट के पास खाली पड़ी जगह में बैठ गए। अपनी सीट पर बैठे लोगों को डर था कि कहीं चालू टिकट लेकर आरक्षित डिब्बे में चढ़ने वाले उनकी सीट पर न बैठ जाएं, इसलिए वे करीब करीब पसरे हुए थे। इस बीच अचानक कंपार्टमेंट में हलचल होने लगी। पूछने पर पता चला कि टीटी चालू टिकट लेकर आरक्षित डिब्बे में चढ़ने वालों को धमका रहा था। उसके हाथ में जुर्माने की रसीदें थीं जिनका इस्तेमाल वह सिर्फ डराने के लिए कर रहा था। जब एक लड़के ने कहा कि उसके पास पैसे नहीं हैं तो टीटी ने उसका गिरेबान पकड़कर डिब्बे से उतार दिया। इसके बाद वह उसे गालियां भी देने लगा।

इस तरह उसने डिब्बे में बैठे लोगों को संकेत दे दिया कि अगर उनके पास भी पैसे नहीं हैं तो यही हश्र उनका होने वाला है। टीटी ने अपनी तेज निगाहों से ऐसे लोगों की पहचान कर ली और उन्हें पैसे निकालने को कहकर आगे बढ़ गया। डिब्बे में टिकट चेक करने के बाद टीटी फिर उन लोगों के पास पहुंचा। चालू टिकट देखकर किसी से तीन सौ तो किसी से चार सौ रुपए मांगने लगा। उसने चालू टिकट वाले किसी भी शख्स को नहीं बख्शा। जिससे जितने बन पड़े, उतने पैसे ऐंठ लिए। लेकिन उसने किसी की भी जुर्माने की पचीर् नहीं काटी। सिर्फ एस-5 और एस-6 में करीब 65-70 लोग टीटी की इस सार्वजनिक लूट का शिकार बने।
डिब्बे में करीब 50 साल की एक महिला भी थी। उसके पास चालू टिकट तो था लेकिन टीटी की जेब गर्म करने के लिए पैसे नहीं थे। वह गलती से आरक्षित डिब्बे में चढ़ गई थी। जब टीटी उसके पास पहुंचा तो वह फूट-फूटकर रोने लगी। महिला टीटी से विनती कर रही थी कि उसे छोड़ दे, लेकिन वह बिना पैसे लिए मानने को तैयार न था। महिला अपने बच्चों की कसम खाकर कह रही थी कि उसके पास पैसे सचमुच नहीं हैं। काफी देर तक बहस करने के बाद टीटी ने अगले स्टेशन पर उसे डिब्बे से उतर जाने को कहा। इसके बाद स्लीपर डिब्बों में लोगों से उगाही के बाद वह खुद एसी कंपार्टमेंट में घुस गया और फिर लौटकर नहीं आया।

Sunday, September 2, 2012

अचानक

अच्छा खासा काम में
लगा आदमी
आ सकता है
सड़क पर
अचानक
कभी भी कह सकते हैं
बॉस-
देख लो अपना ठिकाना
अब तुम्हारी नही जरुरत

अचानक रसोई में
कमी हो सकती है
आटा दाल चावल चीनी की
बंद हो सकता है अचानक
बच्चे को आनेवाला दूध
और उसका प्राइवेट स्कूल में
पढ़ना
मकान मालिक
करवा सकता है
अचानक
कमरा खाली

अभी अभी
थोड़ा ढंग से जीने की
सर उठाती हसरतें
गिर सकती हैं
अचानक
औंधे मुंह..

आदत

अब नहीं वो गुस्सा करते
भाड़ा बढ़ने पर बस का
आटा-दाल-चीनी-सब्जी
महंगी होने पर
नहीं शिकन आती माथे पर
अब वो आदत डाल रहे हैं
पैदल चलने की
हवा खाकर जिंदा
रहने की..

लोकेशन

अभी कल तलक
कहते थे-
नहीं होने देंगे अन्याय
लडेंगे अत्याचारी से
झोपड़ी और गगन चूमती
एसीदार इमारतों के बीच
कर देंगे खत्म फासला
आज वह भी,
उन्हीं लोगों की जमात में
हो गए हैं शामिल
सबसे आगे चल रहे हैं उठाकर
उनका झंड़ा
उसी एसीदार इमारत पर
ले लिया है फ्लैट
बालकनी में खडे़ होकर
देखता है झोपड़ी की तरफ
जहां से उठकर आया है
अब खटक रही है उसे
अपने बगल में
उस झोपड़ी की लोकेशन।

Wednesday, July 11, 2012

गांव में मट्ठा की जगह पेप्सी

शहरों के प्रभाव से गांवों के खानपान में धीरे - धीरे से कृत्रिमता घुलती जा रही है। सतही तौर पर ऐसे परिवर्तन भले ही मामूली नजर आएं लेकिन ग्रामीणों की अर्थव्यवस्था पर इनका गहरा असर पड़ रहा है। बाजार के प्रभाव और खुद को मॉडर्न दिखाने के लिए ग्रामीणों के खानपान में बहुत सी ऐसी चीजें शामिल होती जा रही हैं जिनसे एक दशक पहले तक वे लगभग अनजान थे। इसी के साथ कुछ परंपरागत चीजें पीछे छूटती जा रही हैं। माठा यानि मट्ठा या छाछ का धीरे - धीरे गायब होना इसी परिवर्तन का प्रतीक है। इसे दुर्भाग्य कहें या बाजार का मायाजाल कि गांवों में माठा की जगह पेप्सी , कोका कोला आदि कोल्ड ड्रिंक्स ने ले ली है। गरीब किसानों के बच्चे अब माठा की जगह पेप्सी की जिद करते हैं। कई किसान अनाज बेचकर कोल्ड ड्रिंक्स मंगा रहे हैं। बहुत पहले की बात नहीं है जब गांव के घर - घर मंे माठा भांया जाता था। अक्सर माठा भाने की आवाज से लोगों की नींद टूटती थी। गरीब घरों में सब्जी - दाल न बनने पर माठा में रोटी मीसकर खा ली जाती थी। दूध से यह बिना खर्च आसानी से उपलब्ध था। मेहमानों की आवभगत और शादी समारोहों में माठा से सन्नाटा यानी रायता बनाकर परोसा जाता था। सन्नाटा न हो तो भोज फीका लगता था। ऐसे मौकों पर माठा कम पड़ने पर आसपास के कई घरों से मंगा लिया जाता था। अब शादी समारोह में माठा से बनने वाले सन्नाटे की बजाय कोल्ड ड्रिंक की मांग उठ रही है। बांदा जिले में स्थित मेरे गांव में करीब दस साल पहले शादी या किसी समारोह पर लोगों को कमल के पत्ते पर खाना परोसा जाता था। गांव के तालाब से कमल के पत्ते मुफ्त मेें मिल जाते थे। खाना परोसने से पहले पत्तों को धोया जाता था। जब पानी की बूंदे कमल के पत्तों पर पड़ती थीं तो वे मोतियों जैसी इधर - उधर लुढ़कने लगतीं थीं। अब कमल के पत्तों की जगह फैंसी थालियों ने ले ली है। मेहमानों को पांत मंे बिठाकर प्यार से खाना खिलाने की परंपरा भी भूली बिसरी बात होती जा रही है। करीब 20 साल पहले जब मेरी बहन की शादी हुई थी तब बरात 3 दिन तक ठहरी थी। उस वक्त शादी में 3 दिन लगते थे। आज यह बात किसी अचंभे से कम नहीं लगती। करीब 5-7 साल पहले बरातें ट्रैक्टर - ट्रॉलियों में खूब जाती थीं। अब ट्रैक्टर में बरातें दिखनी लगभग बंद होती जा रही हैं। खुद को मॉडर्न दिखाने की चाह में और दूसरे लोगों के दबाव में लोग कर्ज लेकर बस , जीप , बोलेरो और कारों में बरातें ले जा रहे हैं। बदलाव की मार कैथा नामक फल पर भी पड़ी है। उसकी चटनी का स्वाद आज भी मुझे याद है। हर बार गांव जाने पर सोचता हूं कि कहीं से कैथा की चटनी मिल जाए लेकिन पिछले कुछ सालों से लगातार निराशा ही हाथ लग रही है।

Saturday, January 14, 2012

बेबसी, बदहाली और बुंदेलखंड

अचानक ताऊजी की मौत पर पिछले दिनों गांव जाना हुआ, तो बुंदेलखंड की बदहाली देखकर दिल पसीज गया। गांव-गांव में पसरा मातमी सन्नाटा देखकर सिर से पांव तक सिहरन सी दौड़ गई।

खेती से दो जून की रोटी मयस्सर न होने के कारण वहां से लोगों का बेतहाशा पलायन जारी है। खाली गांव और तमाम रेलवे स्टेशनों पर लोगों के बुझे चेहरे उनकी तकलीफ बयां करते हैं। ये हाल तब है जब यह खेती का सीजन है।

बाकी दिनों के हालात और भी भयावह होते हैं। दिल्ली के निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से महाकौशल और यूपी संपर्क क्रांति एक्सप्रेस बुंदेलखंड जाती हैं। इन दोनों ट्रेनों में, खासकर चालू डिब्बों में पैर रखने तक की जगह मुश्किल से मिलती है। इस बार रिजर्वेशन न मिलने के कारण मैंने सपरिवार चालू डिब्बे में ही जाने का फैसला किया। सवा चार बजे चलने वाली महाकौशल एक्सप्रेस ठसाठस भरी थी।

बड़ी मशक्कत के बाद हम ट्रेन में घुस गए। गाड़ी के अंदर मची बदहवासी और उमस भरी गर्मी ने पसीने से तर कर दिया। गाड़ी के दो घंटे लेट होने पर हमारी हिम्मत जवाब दे गई और हम उतर गए। सोचा कि सवा आठ बजे वाली यूपी संपर्क क्रांति से जाएंगे लेकिन उसमें भी राहत नहीं थी।

इमर्जेंसी खिड़की से घुसकर सीट पर कब्जा करना पड़ा। चार की सीट पर सात लोग किसी तरह एडजस्ट होकर बैठ गए। ऊपर की सीटों पर भी 6-6 लोग उकडूं बैठे थे। आते वक्त मैं इस परेशानी से बचना चाहता था, इसलिए बांदा पहुंचते ही तत्काल कोटे से रिजर्वेशन करा लिया। स्टेशन पर मैं समय रहते पहुंच गया।

वहां लोगों का हुजूम देखकर ऐसा लगा जैसे पूरा बुंदेलखंड ही पलायन कर रहा हो। कोई अकेला तो कोई अपने परिवार के साथ दो वक्त की रोटी की तलाश में शहर जा रहा था। गाड़ी आई और देखते की देखते भूसे की तरह भर गई। पूरे स्टेशन पर अफरातफरी का माहौल था। अधनंगे बच्चे खाली पांव अपने मां-बाप के साथ इस डिब्बे से उस डिब्बे में भटक रहे थे।

औरतें गोदी में बच्चे लिए और सिर पर गठरी बांधे पागलों की तरह यहां-वहां भागती दिखीं। चालू डिब्बे में जगह न मिलने पर लोग आरक्षित डिब्बों में घुस गए। गेट के पास थोड़ी सी जगह में दर्जनों लोग किसी तरह बैठ गए। कुछ अंदर आकर किसी के पैर के नीचे तो कोई किसी की सीट के नीचे घुसकर लेट गया।

वक्त के मारे इन लोगों को टीटी ने भी नहीं बख्शा। जिससे जितना बना उसने ऐंठ लिए। थोड़ी देर के लिए मैं टीटी की काली कमाई का हिसाब लगाने लगा। फिर अचानक लोगों के मुरझाए चेहरों पर नजर टिक गई। वे काफी देर तक मेरे जेहन में घूमते रहे। ख्याल आया कि यही लोग शहर की किसी झुग्गी झोपड़ी में अपने ठिकाने की तलाश करेंगे।

जिनको यह भी नसीब नहीं होगा वे किसी फ्लाईओवर के नीचे या फुटपाथ पर रात गुजारेंगे। रात की ड्यूटी में जब कैब से घर लौट रहा होता हूं, ऐसे लोग अक्सर मुझे बड़ी तादाद में नजर आ जाते हैं।

Monday, January 9, 2012

बसों में लटका भविष्य

काफी दिनों के बाद उस रोज सुबह उठा और घूमने निकल गया। सुबह-सुबह कंधों पर बस्ता टांगे और सज-धज कर बच्चे स्कूल जा रहे थे। अलग-अलग यूनिफॉर्म उन पर खूब फब रही थीं। बस स्टैंड पर बच्चों की बहुत भीड़ थी। उनमें ज्यादातर सरकारी स्कूलों के बच्चे थे जो आमतौर पर पब्लिक बसों या कोई और वाहनों से स्कूल जाया करते हैं। सभी को बसों का इंतजार था। काफी देर बाद कोई बस आती और बिना रुके ही आगे बढ़ जाती। कई बस ड्राइवर तो बच्चों को देखकर स्पीड दोगुनी कर लेते। यह देख कुछ बच्चे गुस्से में आकर ड्राइवर की मां-बहन एक करते और अगली बस का इंतजार करने लगते।

कोई-कोई बस ड्राइवर दरियादिली दिखाते हुए बस रोक देता तो बस ठसाठस भर जाती। अंदर एक इंच जगह न बचने पर बसों के दोनों दरवाजों पर दर्जनों बच्चे लटक जाते और किसी तरह जान जोखिम में डालकर स्कूल पहुंचते। उन्हें लटका देखकर एकबारगी लगता कि अगर उनका हाथ छूट गया तो...। हर बार लड़कियां और छोटे बच्चे सुस्त पड़ जाते और बसों में नहीं चढ़ पाते। बड़े बच्चों के जाने के बाद ही उनका नंबर आ पाता। यह सब देखकर मुझे अपने स्कूल के दिन याद आ गए। करीब 15 साल पहले मुझे भी इसी तरह बसों में लटककर स्कूल जाना पड़ता था। और अगर स्कूल पहुंचने में देर हो जाती तो स्कूल के पीटीआई (अनुशासन सुनिश्चित कराने वाले शिक्षक) मुर्गा बना देते, फिर स्कूल की सफाई कराते। कभी-कभी तो दो-चार डंडों का प्रसाद भी देते। तब से अब तक एक लंबा अरसा गुजर गया है।

दिल्ली के एक कोने से दूसरे कोने तक, यहां तक कि दूसरे शहरों तक मेट्रो फर्राटे भर रही है। कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन कर दिल्ली अपने आपको धन्य समझ रही है। रफ्तार और रोमांच का खेल फॉर्म्युला-1 दिल्ली के पड़ोस में आयोजित हो चुका है। फ्लाईओवरों और चौड़ी सड़कों के बीच भागती दिल्ली ने इस दौरान विकास की कई इबारतें लिखी हैं। इन सबके बीच अगर नहीं बदला तो घर से स्कूल और स्कूल से घर आने का जोखिम भरा सफर। घर से महज तीन या चार किलोमीटर दूर स्कूल जाने की व्यवस्था दिल्ली अपने बच्चों के लिए नहीं कर पाई है। मुझे याद है कि एक बार स्कूल की छुट्टी होने पर बच्चों की भारी भीड़ थी। कोई ड्राइवर बस नहीं रोक रहा था। बस में बच्चे न चढ़ जाएं यह सोचकर एक ब्लूलाइन बस के ड्राइवर ने स्पीड बढ़ा दी। इस दौरान एक बच्चा उसके नीचे आ गया और अपने दोनों पैर गंवा बैठा। इस तरह की खबरें अब भी आती रहती हैं। उस रोज सुबह-सुबह मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि दिल्ली की प्राथमिकताएं कितनी अजीब हैं। बच्चे बसों में जिंदगी और मौत के बीच झूलते हुए भले ही स्कूल जाएं पर दिल्ली वालों को तो मॉल्स चाहिए। स्कूलों में हालात बेहतर हों, इससे ज्यादा जरूरी है मेट्रो घर के पास से गुजरे। मैं सोचने लगा कि अगर बच्चे सचमुच देश का भविष्य हैं, तो यह भविष्य कब तक बसों में लटका रहेगा?

Friday, December 30, 2011

गांव में मोबाइल टावर

जितनी बार गांव गया हूं, हर बार उसे एक जैसा पाया है। गांव को जोड़ने वाली करीब आठ किलोमीटर लंबी वही टूटी सड़क, दो मटकी सिर पर रखे और एक कांख में दबाए कुएं से पानी भरकर जातीं औरतें, कुएं के पास हमेशा एक ही मुद्रा में खड़ा बरगद का पेड़, खंभों पर लटके बिजली की राह तकते तार, चबूतरों पर बैठकर ताश खेलते लोगों का समूह- कुछ नहीं बदला।

बुंदेलखंड के बांदा जिले में बसे मेरे गांव की हमेशा यही तस्वीर जेहन में थी। गांव पहुंचने के लिए डग्गा (कई जगह इसे जुगाड़ भी कहा जाता है) से जाना पड़ता है। डग्गा की सर्विस बड़ी चुस्त-दुरुस्त है। यह हमेशा तय वक्त पर चलता है। इसे पकड़ने से चूके तो पैदल ही यात्रा करनी पड़ती है। लेकिन थोड़े दिनों पहले डग्गा से गांव गया तो वहां पहुंचते ही मेरे जेहन में बसी गांव की तस्वीरें टूटनी शुरू हुईं। पहला झटका गांव के बाहर खेत में खड़े मोबाइल टावर को देखकर लगा। बड़ा ताज्जुब हुआ कि जिस गांव में सरकार की तमाम योजनाओं ने पहुंचने से पहले ही दम तोड़ दिया, जहां की सड़क लंबे अरसे से अपनी बदहाली पर रो रही हैं, जहां लोग मिट्टी के तेल की डिबिया जलाकर घरों में रोशनी करते हैं, वहां सूचना तकनीक ने दस्तक दे दी!

अपने गांव में वह टावर देखकर मैं सोच में पड़ गया कि आखिर इस उजाड़ और सूखे गांव में मोबाइल कंपनियों को क्या मिलेगा। लेकिन कुछ देर बाद ही पता चल गया कि मैं गलत था। मोबाइल कंपनी अपने मकसद में कामयाब हो गई थी। गांव के युवाओं के हाथों में सेलफोन देखकर यकीन हो गया कि बाजार मेरे दरिद्र गांव तक पूरी तैयारी के साथ पहुंचा है। गांव में मोबाइल क्रांति की वजह मोबाइल टावर ही था। पहले इक्का-दुक्का लोगों के पास ही मोबाइल फोन होता था। आसपास टावर न होने पर नेटवर्क नहीं आता था। गांव के बाहर या बगल के पहाड़ पर जाने पर फोन नेटवर्क पकड़ता था और बात हो पाती थी। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। टावर लगने पर ज्यादातर घरों में मोबाइल ने अपनी पैठ बना ली है। युवाओं के बीच अब चर्चा के विषय भी बदल गए हैं। अब अधिकतर बातें मोबाइल को लेकर ही होती हैं। मसलन, तेरा कौन सी कंपनी का फोन है, कैमरा है क्या, कितनी मेमरी है, कौन-कौन से गाने हैं आदि।

कई घरों में बात करने पर पता चला कि जब से मोबाइल टावर लगा है, युवा अपने गरीब मां-बाप पर मोबाइल के लिए दबाव बनाने लगे हैं। जिद पर अड़कर कई युवा मोबाइल हासिल भी कर चुके हैं। कुछ मां-बाप ने कर्जा लेकर बच्चों को मोबाइल दिलवाया है। हैरानी यह देखकर भी हुई कि मोबाइल टावर के लिए अलग से बिजली की लाइन पहुंची थी। गांव के घरों में भले ही अंधेरा हो लेकिन टावर की बिजली की खुराक में कमी नहीं आने दी गई थी। यह देखकर मैं सोचने लगा कि क्या प्राइवेट कंपनियां सरकारों के लिए उन लोगों से ज्यादा अहम हो गई हैं जिन्होंने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया है?

Saturday, July 3, 2010

आकर दिल्ली में










तमाम
दिक्कतों के बाद
गुज़ारा चल रहा था उनका
आकर दिल्ली में.
तीस रूपए रिक्शे का भाडा
चुकाने के बाद
बच जाते थे कुछ पैसे
आ जाते थे थोड़े चावल
थोड़ी सब्जी, थोड़ी दाल
भूखा नहीं सोना पड़ता था
आकर दिल्ली में.
सुना है रहनुमाओं को अब
बुरी लगने लगी हैं
इनकी शक्लें
मेहमान इनको देखकर क्या सोचेंगे
सता रही है यह चिंता.
बन गई हैं योजनायें
बेदखली की
अब कहां ढूंढें ये ठौर ठिकाना
आकर दिल्ली में.

Monday, February 8, 2010

राहुलमय मीडिया

राहुल गांधी के दौरे हमेशा सुर्खियों में रहे हैं। उनके हर दौरे में मीडिया की एक बहुत बड़ी जमात उनके आगे पीछे ऐसे डोलती है जैसे राहुल बाबा उनके तारणहार हों। राहुल बाबा ने क्या खाया, क्या पिया, किससे मिले, कहां गए, किस दलित के घर रात बिताई, किसके साथ खाना खाया, किस विश्वविद्यालय में छात्रों से मुखातिब हुए, सब पर मीडिया की पैनी नज़र रही।

मुम्बई में तो मीडिया ने राहुल बाबा के गुणगान की सारी हदें तोड़ दीं। चैनलों ने राहुल बाबा की पल-पल की खबर दी, हर पल की खबर दी और खबर हर कीमत पर दी। राहुल ने एटीएम से पैसे निकाले, लोकल ट्रेन में सफर किया। लोगों से बात की। उनकी परेशानियों के बारे में पूछा। लगभग सभी छोटे-बडे़ चैनलों पर राहुल बाबा के भजन चल रहे थे। इन भजनों को देखकर लगा जैसे राहुल बाबा कोई ऐतिहासिक पुरूष हों बहुत बड़े मिशन पर निकले हों। भारत के एकमात्र ऐसे व्यक्ति हों जिन्हें भारत की सचमुच बहुत चिन्ता हो। उस व्यवस्था में बदलाव लाना चाहते हों जो उनके पूर्वजों की देन है। उनके पीछे मीडिया की इतनी बड़ी जमात देखकर एक पल ऐसा भी लगता है जैसे कांग्रेस ने इन सभी चैनलों के साथ डील कर रखी हो। यह अलग बात है कि हमेशा यह बताने की कोशिश की जाती है कि राहुल ने मीडिया से दूरी बनाकर रखी या मीडिया से बचते रहे। लेकिन वे कभी मीडिया से नहीं बच पाते। देश के अति पिछले इलाकों में दौरों के दौरान भी नहीं बचे जहां मीडिया के दर्शन दुर्लभ होते हैं। राहुल बाबा गए तो मीडिया को भी मजबूरन पीछे-पीछे जाना पड़ा।

राहुल गांधी पिछले साल जब छत्तीसगढ़ दौरे पर थे, एक छात्र ने उनसे एक बहुत वाजिब सवाल पूछा कि भारत की आजादी के इतने बरस बाद भी कृषि मानसून पर क्यों निर्भर है, जबकि देश में आजादी के बाद से कुछेक सालों के आलावा कांग्रेस का ही राज रहा है। राहुल गांधी ने बहुत मासूमियत से इस सवाल को टाल दिया था। राहुल गांधी अक्सर ऐसे चुभने वाले सवालों को ऐसी ही मासूमियत से टाल देते हैं।

राहुल गांधी को सचमुच देश की फिक्र है। गरीब-गुरबों की चिंता है। छत्तीसगढ़ दौरे से पहले साल 2008 में सूखे की मार झेल रहे बुन्देलखण्ड दौरे पर भी गए थे। लोगों से मिले, उनसे बात की। यह साबित करने की कोई कसर नहीं छोड़ी थी कि वे ही उनके सच्चे हितैषी हैं, मायावती सिर्फ उनका वोट बैंक के तौ
र पर इस्तेमाल कर रही है। उन्होंने बुन्देलखण्ड की प्यासी जमीन पर खूब पसीनें की बून्दे गिराईं।

दूसरे दिन शायद बुन्देलखण्ड दौरे की थकान मिटाने के लिए आईपीएल के मजे लूटते नज़र आए। सहसा लगा कि क्या ये वही राहुल गांधी है जो कल तक बुन्देलखण्ड के किसानों और दलितों के घर में उनके हालात पर दुखी और चिन्ता जाहिर कर रहे थे। उनके सच्चे और एकमात्र शुभचिन्तक होने का दावा कर रहे थे। किसानों के मुरझाए झुर्रीदार चेहरों और दो वक्त की रोटी के लिए भगवान से दुआ मांगने वाले लोगों की तस्वीरें इतनी जल्दी उनकी दृष्टि से ओझल हो जाएंगी? क्योंकि अगर आप विदर्भ बनते जा रहे बुन्देलखण्ड के किसानों के घर में घुसकर देखें तो आपको एक अजब से बैचनी होगी। उनसे बात करते वक़्त हो सकता है कि यह व्यवस्था से कोफ्त होने लगे। अगर आपको सचमुच उनकी चिन्ता है तो उनकी हालत देखकर आपकी रातों की नीन्द उड़नी तय है। अगर ऐसा नहीं है तो आप उनके हमदर्द होने का जो दावा करते हैं, वह झूठा है, खोखला है। आपकी बातें सिर्फ कागजी हैं।

पर इससे मीडिया को क्या? जो बिकता है वो दिखता है। अब तो जो बिकता नहीं उसे भी बेचने की तमाम कोशिशें मीडिया कर रहा है। पेड न्यूज का जमाना है। कहीं ऐसा तो नहीं पेड न्यूज के जरिए देशभर में राहुल बाबा की ऐसी छवि और माहौल बनाया जा रहो हो ताकि आने वाले सालों में वे बिना कोई परेशानी आसानी से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर चढ़ बैठें?

Monday, February 16, 2009

वो बात

बची रह गई
हर बार
वो बात,
जो थी जरूरी
तमाम बातों की
परतों में दबी
इन्तेज़ार करती रही
अपनी बारी का
बेमतलब था जो
कहा गया बहुत बार
बेवजह के किस्से
दुनियादारी की बातें
चलती रहीं
अबाध- निरंतर
जरूरी था जो
पड़ा रहा
धुल में लिपटा
एक कोने में
झटपटाता रहा
व्यक्त हो जाने को
और जब वो व्यक्त हुआ
कोई रहा न
सुननेवाला..

Thursday, December 18, 2008

Wednesday, April 23, 2008

जमाना बदल गया है

लोग कहते हैं जमाना बदल गया है
रहा करते थे जहां वो आशियाना बदल गया है

तोडकर सीमाएं जग की प्रेम अब स्‍वछंद हुआ
मूक बनकर देखता हूं, अंदाज पुराना बदल गया है

बर्बाद कर दे भला, तूफान किसी का घर बार
तूफां में उजडे घर को, फिर से बसाना बदल गया है

लौट जा रे तू मुसाफिर वापस अपनी राहों में
आजकल इस शहर में, रस्‍ता बताना बदल गया है

मेरे सुख में हंसता था, मेरे दुख में रोता था
एहसाह मुझे अब होता है, बेदर्द जमाना बदल गया है

बदहाल बुंदेलखंड

बुंदेलखंड के बांदा जिले का बसहरी गांव जितनी बुरी हालत में इस बार है, शायद ही पहले कभी इतनी बदतर हालत में रहा हो। एक तो पानी नहीं बरसा। खेती चौपट हो गई और दूसरी तरफ चार साल से पड रहे सूखे की मार ने इस इलाके की कमर तोडकर रख दी है। किसानों की फसल तक की लागत नहीं निकल पाई। इस बार न गांव में ताजगी थी और न ही वहां की माटी में सुगंध। थी तो सिर्फ हर ओर बदहाली और कब्रिस्‍तान का सा सन्‍नाटा, भूखा मरता किसान और प्‍यासे मरते मवेशी। कुंए में एक बूंद पानी न था और न ही तालाब में। कामता के पंद्रह बीघा खेत में मात्र चार पसेरी गेहूं हुआ। उसे यह चिंता खाए जा रही है कि इस साल वह अपना पेट कैसे पालेगा। इलाके में चोरी चकारी बढ गई है। राहगीरों को रास्‍ते में ही लूट लिया जाता है, और अंधेरा होते ही लोग घर से बाहर निकलने से घबराते हैं। बसहरी की तरह ही बुंदेलखंड के अधिकांश गावों का हाल है। अगर देश का सबसे बदहाल क्षेत्र इसे कहा जाए जो गलत नहीं होगा। जब से गांव जा रहा हूं, तब से इसे ऐसे ही पाया है। न कोई विकास हुआ और न ही किसी को यहां की सुध है। मात्र कुछ सरकारी नल ही हाल मे यहां लगे हैं जो लोगों की प्‍यास बुझाने का एकमात्र जरिया है। जिस के घर के सामने यह नल लगे हैं, वह दूसरों को पानी न भरने देने की भरपूर कोशिश करता है। उस नल पर अपना अधिकार जताता है। संचार क्रांति और आधुनिकता के प्रतीक एयरटेल का टॉवर गांव में जरूर लग गया है। भूख से मरते किसान को मोबाइल के मोह में फंसाया जा रहा है। अखबारों में पढा की राहुल गांधी बुंदेलखंड के दौरे पर हैं, वे यहां के हालात को जानने और समझने गए हैं। उन्‍होंने कई गांवों का दौरा किया और किसानों की बदहाली देखी लेकिन अगले ही वे आईपीएल के मैच में दिखे। उन्‍हें देखकर हैरानी इस बात की हुई कि यदि कोई सचमुच किसानों और इस क्षेत्र के गरीबों को शुभचिंतक है तो उनकी स्थिति देखकर कोई कैसे चैन से सो सकता है। जो आदमी कल तक यहां की स्थिति का जायजा ले रहा था, लोगों की बदहाली जानकर भी कैसे उसे आईपीएल का मैच सुहा सकता है। कैसे वह उन किसानों के मुरझाए हुए चेहरों को भूलकर खचाखच भरे स्‍टेडियम में मैच का मजा ले सकता है।